बहिष्कृत विद्वता

धूलकण सँ भरल शरीर लऽ
सडक बीच विश्रामक लेल ।
बैसल एक मनूख निश्चिन्त,
बनल बच्चा सबहक खेल ।।१।।

फेकैत बच्चा सब पाथर, ईंटा,
साधन बनल ओ बालक्रीडा के ।
बच्चाक प्रहार सँ बचैत, प्रसन्न,
उडवैत हँसि कय अपन पीडा के ।।२।।

रोकलहुँ बच्चा सबके हम,
मनुख पर पाथर फेकवा सँ ।
नाम ठाम की पुछवैन्हि हम,
विक्षिप्त लगलाह देखला सँ ।।३।।

मित्रक संग एक दिन सडक पर,
गप्पसप्प करैत काल ओ पागल ।
“औ बाबु, पाँच टाका दिय हमरा”
नीडर भऽ हाथ पसारि माँगल ।।४।।

ओ मनुखक दुर्दशा देखि कय,
हमर हृदयभरि उपजल पीडा ।
सामाजिक संरचनाक परिणाम
कहि, अथवा नियति के क्रीडा ।।५।।

टाका पावि हर्षित मुद्रा सँ,
कृतज्ञता देखौलक पागल ।
दुर्लभ वस्तु पावि तत्क्षण,
आनन्दित भऽ नाचऽ लागल ।।६।।

ंएकटा बिचित्र प्रश्न समाओल,
हृदय के आहत करैत मन में ।
मानव समाज में मनुखक गति,
की ओ पापी छल पुर्वजन्म मे ?।७।।

सामाजिक संरचना के बिगडल
अवस्था मे, जन्मैत छै ई तत्व ।
केन्द्रित होइछ, सामाजिक सत्ता,
अपहृत होईछ, जौं सब स्वत्व ।।८।।

एकदिन साँझ, दरवाजा पर,
बच्चा सबके पढबैत काल ।
पागल खोजैत हमरा आयल,
बैसि रहल आगू मे जंजाल ।।९।।

‘भेनिस के व्यापारी’ नाटक मे,
बुद्धिमान बकिल छल पोर्सिया ।
“ईट वाज गिभेन भेरी गुड
ज्स्टिस बाई द पोर्सिया” ।।१०।।

पगलक मुँह सँ अंग्रेजीक
बोल सुनि, भेलहुँ चकित ।
शिक्षित लोकक ई दुर्दशा,
मन भेल अति व्यथित ।।११।।

धारा प्रवाह पढाबऽ लागल,
जकरा हम कहलियै पागल ।
आत्मग्लानि सँ मन भरि गेल,
बड अपराध भेल जकाँ लागल ।।१२।।

शी सेभ्ड एन्टेनियोज लाइफ,
क्लेभरली फ्रोम द शायलौक ।
गेभ न्यू लाइफ टु एन्टेनियो,
युजिंग हर करेक्ट डायलौग ।।१३।।

नाटकक पाठ के प्रश्नोत्तर सब,
विद्यार्थी सबके करोलन्हि कंठाग्र ।
असीम श्रद्धा जागल हुनका प्रति,
देखलहुँ हुनकर जे बुद्धि कुशाग्र ।।१४।।

श्रद्धा सँ नतमस्तक छलहुँ,
भेलहुँ हम विद्वता सँ द्रवित ।
नाम ठाम शिक्षाक बिषयमे,
प्रश्न केलौं भऽ कऽ चकित ।।१५।।

मनुख कियो नहि कहैत छैथ,
नाम रखने छैथ हमर पागल ।
अंग्रेजी मे मास्टर डिग्री अछि,
भात खुवाउ भूख अछि लागल ।।१६।।

आदरपूर्वक भोजन करवाक लेल,
देलियन्हि पीढी, भोजन थारी मे ।
आँगन मे बैसि, खायब पात पर,
नहि खायत छी कहियो थारि मे ।।१७।।

आग्रह मानू हमर महानुभाव,
थारी परोसल अछि श्रीमान् ।
विशेष पाहुन बनि आयल छी,
हमरा कऽ रऽ दिअ सम्मान ।।१८।।

बैसि गेलाह आँगन माझ,
नहि मानलन्हि कोनो बात ।
लज्जित भेलौं हम, जखन,
माटि पर ओछेलन्हि पात ।।१९।।

इच्छा अनुरुप देल भोजन,
हुनका आगू मे, पात पर ।
भोजन करऽ टुटि पडलाह,
बिना हाथ धोने, भात पर ।।२०।।

ईच्छापूर्ण भोजन केलन्हि,
सन्तुष्ट भ गेलाह एकदिन ।
क्षुधा तृप्ति के साधन नहि,
कोना बिततैन्ह ई दुर्दिन ।।२१।।

ऐठाम बैसू, निश्चिन्त भऽकऽ
लऽकऽ अपन मान, सम्मान ।
नहि चिन्हत, कियो प्रतिभा,
देत प्रताडना, औ अपमान ।।२२।।

कोन गाछक फल छी अहाँ,
सहैत हेताह विपति अथाह ।
मातापिता, भाईबहिन पत्नि,
भेल सबहक मनोरथ स्याह ।।२३।।

निरुद्देश्य स्वतन्त्र, ऐ मानव के,
स्थिर स्वतन्त्रता मे बान्हू कोना ।
जरैत, मरैत, विलक्षण प्रतिभा के,
हरियर, फलदायी, बनाबी कोना ।।२४।।

समाज सँ व्यक्ति बनय,
व्यक्ति सँ बनय समाज ।
सभ्य शिष्ट बुद्धि ज्ञान सँ,
पूरा होईछ व्यक्ति समाज ।।२५।।

जे समाज ऐ प्रतिभा के,
जन्म देलक, कठीन सँ ।
संरक्षणक अभाव मे ओ,
विस्थापित कतेक दिन सँ ।।२६।।

सन्तुलित होमय के लेल,
राख चाहैत छी परतारि ।
किञ्चित उपचार क के,
लेब हम हिनका सम्हारि ।।२७।।

पहुँचा देबैन्ह ओय समाज मे,
जिनकर छैन्ह, पूर्ण अधिकार ।
हिनकर सार्थकता सिद्ध करब,
सम्हारताह अपन घर परिवार ।।२८।।

एकटा कपडा देब हमरा,
जीर्ण भेल अछि तनपर ।
व्यक्ति के शब्द लागय,
तीर जकाँ आहत मनपर ।।२९।।

कपडा लय बिलीन भेलाह,
नीरव निशा के गहनता मे ।
असफलता के सोचैत रहलौं,
अन्हार रात्रि के मौनता मे ।।३०।।

२०४७ आस्विन  ११ गते, फत्तेपुर – ८  बलार्दह , सप्तरी 

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