हमहुँ  छी मानव

                                                                                                   
हमहुँ छी     मानव,    ऐ समाजक,
त्याज्य  औ नहि     कोनो काजक ।
सामाजक बिषमताक जहर पिबैत,
सजाय   भोगैत  छी,  दीर्घकालक ।।१।।

हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

मनुख थीक सामाजिक प्राणी,
लिखल भरल मानव इतिहास ।
मनुख मनुख बीच भेद बिषम,
भेल अछि शत्रुतापूर्ण सहवास ।।२।।

के छथि समाज केर विभाजक ?
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

सम्पन्न, विपन्नक बैरभाव में,
आहत अछि, मानव जीवन ।
मानव भयभीत अछि मानव सँ,
त्राहि त्राहि करैत जन जीवन ।।३।।

ई भेद मनुख में कोन काजक ?
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

सम्पन्नताक अहंकारक शिकार,
एकटा निर्धन, असहाय मानव ।
मानव दम्भ के  बलि चढि गेल,
मानवीय  गुण के  कि बखानव ।।४।।

पुनरावृति छी जंगल राजक ।
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

जाति बाँटल, पाति बाँटल,
उँच नीच के भेद पसारल ।
मानव के नैसर्गिक एकता ?
नहि धुअल, नहि पखारल ।।५।।

एकता अछि कोनो काजक ?
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

सुविधा सम्पन्न उच्च अट्टालिका,
वैभव रक्षा हेतु नियुक्त द्वारपाल ।
कवच कुण्डलयुक्त, ऐ जीवन के,
वर्गभेद कहि या कोनो कमाल ?।६।।

नहि रहल अछि  कोनो काजक ।
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

प्राकृतिक रुप सँ मानव में,
नहि कोनो शत्रुता नहि भेद ।
अवसर पावि श्रेष्ठता आयल,
अवसरहीन के भेटल विभेद ।।७।।

कि एकरे मानू सम्बन्ध विभाजक ?
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

श्रेष्ठता, दम्भ, अहंकार, उन्माद,
नहि मानवताक गुणक संस्कार ।
मेटा गेल अछि सबहक अस्तित्व,
पृथ्वी पर छल जकर अधिकार ।।८।।

ई सब तत्व छी सम्बन्ध नाशक ।
हमहुँ छी मानव, ऐ समाजक ।

(२०४८ भाद्र १६ गते, फत्तेपुर ८,  बलार्दह ,सप्तरी)

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