अहाँ चलि गेलहुँ

हृदयक सिंहासन पर बैसावए सँ पहिनहि,
अहाँ चलि गलहुँ ।
पूजाक फूल चरण पर चढेएवा सँ पहिनहि,
अहाँ चलि गेलहुँ ।

लाज सँ बन्द छल पलक,
नहि देखलहुँ एको झलक ।
अपन परमेश्वरक आकृति,
ब्याकुल छल, भाव मनक ।।

दर्शन हेतु पल खोलवा सँ पहिनहि,
अहाँ चलि गेलहुँ ।

नव परिधान सँ अंग सजल,
आभूषण सँ शरीर भरल ।
अंग अंग सजल मेहदी सँ,
सोलह श्रँगारबीच नैन सजल ।।

श्रृँगारक मान पान करवा सँ पहिनहि,
अहाँ चलि गलहुँ ।

फूल सन कोमल आश हमर,
वस्त्र आभूषण करे उपहास ।
मनमे दहके वियोगक ज्वाला,
श्रृँगार करय व्यंगक अट्टहास ।।

मनक भाव व्यक्त करवा सँ पहिनहि,
अहाँ चलि गलहुँ ।

हे आराध्यदेव करबद्ध हम,
क्षमा याचक छी निःशब्द ।
अनजानक गल्ती हमर,
बिसरि लिख भेजु दू शब्द ।।

हमर अपराध दर्शावए सँ पहिनहि,
अहाँ चलि गलहुँ ।

 

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