“राष्ट्रियता हमारा गौरव है, शान है । देशभक्तों की जान है, पहचान है । राष्ट्रियता की आन पर, कुर्वान हमारी जान है ।” अपनी राष्ट्रियता प्रति नागरिकों का यही उद्गार बयाँ होता है । राष्ट्रियता प्रति नागरिक त्यागी, बलिदानी भावना से इसलिए ओतप्रोत रहता है कि उसी अनुपात में राष्ट्र अपने नागरिक के हक, अधिकार प्रति सचेत रहता है । समान सम्मानपूर्वक व्यवहार से भावनात्मक सम्बन्ध का विकास होता है और एकत्व का डोर सबल, सशक्त बनता है । यही आधार राष्ट्रियता को सशक्तता प्रदान करता है । यहाँ न भेदभाव होता है न असमान व्यवहार । सबल राष्ट्रियता के मजबूत सूत्र में विविधता इस कदर पिरोयी रहती है कि इसे सरल रुप से अलग कर पाना असम्भव रहता है ।
जो राष्ट्र अपने नागरिक के प्रति पूर्वाग्रही हो, भेदभाव रखता हो, संकीर्ण और पक्षपाती चिन्तन रखता हो, वहाँ की राष्ट्रियता अति दुर्बल और अपाँग होती है । ऐसी राष्ट्रियता भितर से खोखली रहते हुवे भी बाह्य रुप से अपनी श्रेष्ठता का स्वाँग भरती रहती है । अपनी झूठी शान बघारते हुवे न अपनी कमजोरी को उजागर करती है न इसे सुधारने की चेष्टा । नेपाली राष्ट्रियता का ऐसा ही बूरा हाल है । शाहवंशी सामन्तों का नायक पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल में रहे छोटे छोटे राज्यों को जितकर नेपाल राज्य खडा किया । खसशक्ति पर आधारित यह गोर्खाली राज्यसत्ता इन्हीं सामन्तों के कुलदेवता के रुप में पूजित रहा । खसों को छोड इसने किसी को न प्रसाद दिया न वरदान । देश की विविधताओं से इसका कोई सम्बन्ध न बन पाया । अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए शोषण का आधार ही जनता थी । जनता का चरम शोषण से ही गोर्खाली राज्य हरा भरा था । एकबार स्थापित सामन्तों का पृष्ठपोषक यह राज्यसत्ता बिना किसी परिवर्तन के २५० वर्षों से अपने एकात्मक स्वरुप मे कायम है । इस राज्य को साझा बनाने का अभीतक किया गया अनेक प्रयास विफल रहा है ।
शदियों से शासन करते आ रहे खस जाति की सबसे बडी विशेषता यह है कि इसने २५० वर्षों से अनेक अवरोध के बावजूद भी अपने वर्चस्व की राज्यसत्ता को कायम रखा । अनेक संघर्ष के झंझावातों के प्रभाव से राज्यसत्ता को बचाये रखा । आज जब नागरिक अपने अधिकार के प्रति सजग हो गया है, और संघर्ष का ताण्डव शुरु हो चुका है ऐसे अवस्था में भी राज्यसत्ता को अपरिवर्तनीय रुप में कायम रखना वास्तव में अद्भूत है । खस शासकों का राज्य व्यवस्था संचालन में भले ही सिद्धहस्तता प्राप्त हो, किन्तु यह सम सामयिक यथार्थता के परे है । आज का विजय कल मातम में परिणत हो सकता है । समय की आवश्यकता को नजर अन्दाज कर अपनी कूटनीति की कुशलता पर इतराना क्षणिक सुख ही है । आज नेपाल का नागरिक अधिकार के लिए पूर्ण जागृत अवस्था में है । खस राज्यसत्ता किस कदर जनता को अधिकार विहीन अवस्था में रखा इसका बहूत बडा फेहरिस्त जनता के पास है । संसार द्रूतगति से बदल रहा है । जनता अपने अधिकार के लिए उठ खडी हो गई है । यहाँ भी परिवर्तन की भीषण आँधियाँ आईं हैं, जिसका प्रभाव अभी तक कायम है । इन परिवर्तनों के प्रभाव से राज्य को बचाकर यथास्थिति में ले जाने का कूटनीतिक चाल खेली जा रही है । परिवर्तनकारी और यथास्थितिवादियों के बीच रस्साकशी में फँसी नेपाल की अभी की राजनीति किस दिशा में देश को ले जायगी, कहना मुश्किल है । यथास्थितिवादियों ने जिस ढंग से परिवर्तनकारियों को जकड रखा है, उस अवस्था में यदि कोई चमत्कार न हो तो यथास्थितिवादियों की जीत सुनिश्चित है । राजनीतिक अखाडे में परिवर्तनकारी शक्तियों को थकाकर इस प्रकार कमजोर बनाया गया कि वह अपने अधिकार को स्थापित कर सकेगा, मुश्किल लगता है ।
समयानुकूल परिवर्तन न होना, समय के बहाव को बलपूर्वक रोकना, जनता की आवाज को दबाना, यह सब विनाश का कारण बन सकता है । एक अप्रत्याशित रुप से जन्मी परिस्थितियों ने राजा को वनवास दे दिया था । इस संक्रमण काल में ऐसी परिस्थिति फिर नहीं जन्मेगी, कहना मुश्किल है । और तब किसका विनाश होगा, यह तो समय ही कह सकेगा ।
खस साम्राज्य की राज्यसत्ता अपने ही देश में सभी समुदायों में लोकप्रिय न हो सकी । खस साम्राज्य को स्वीकार करवाने का दीर्घकालीन प्रयास भी कामयाव न हो सका । इसका कारण था कि खस संस्कृति को बलपूर्वक लागू करवाया गया, जिसे जनता स्वीकार न कर सकी । “राजा सबका साझा” “हाम्रो राजा हाम्रो देश, हाम्रो भाषा हाम्रो भेष, प्राणभन्दा प्यारो छ” “राजा एकता का प्रतीक” आदि गोर्खाली महानवाणी का प्रयोग बहुत तीब्र गति से करवाया गया । अपने देश के विविध संस्कृतियों से सम्बन्ध न रखनेवाली राज्यसत्ता अपनी संस्कृतियों को जनमानस में समायोजन न करवा सकी । अपनी संस्कृति को जनता के उपर निरंकूशता से लादा गया । “टोपीवाला फोटो के बिना नागरिकता न पाना” “नेपाली टोपी बिना सरकारी कार्यालय में प्रवेश निषेध” “सरकारी सेवा के लिए नेपाली भाषा का जानना आवश्यक” ऐसे ही ढेर सारे प्रतिबन्धात्मक नियम लगाये गए थे जिसका उद्देश्य था सभी संस्कृतियों पर खस संस्कृति का रंग जमाना । बाध्यात्मक परिस्थितियों में इसका किञ्चित प्रभाव तो पडा किन्तु यह प्रभाव स्थायी न रह सका । खसों ने अपना राष्ट्र, अपनी राष्ट्रियता का जितना ढोल पीटा है, वास्तविक रुप में यह उतना ही कमजोर अवस्था मे है । सिर्फ एक ही वर्ग के बलबूते पर राष्ट्रियता का मजबूत होना सम्भव नहीं है । इसके लिए सभी नागरिकों का भावनात्मक सहयोग आवश्यक है, जिसकी जरुरत राज्य को कभी महसूस नहीं हुई । राज्य के विभेदपूर्ण व्यवहार ने अन्य नागरिकों को राष्ट्रिय मूलधार से हमेशा अलग ही रखा । जितनी उदारतापूर्ण अवस्था मे राज्य प्रस्तुत हो, मानवता का जितना भी प्रदर्शन कर ले, अपने को जितना भी सहिष्णु बना ले, राष्ट्र और राष्ट्रियता को यह साझा बनने नहीं देगा । उसी तरह राज्य व्यवस्था को अपनी पकड से आजाद नहीं होने देगा । विरासत से कुछ ऐसा ही संस्कार प्राप्त है, जो विनाश से पूर्व चट्टान की तरह अडिग है ।
विविधतायुक्त नेपाली राजनीति में जनसंख्या के अनुपात में दो परस्पर भिन्न संस्कृति की राष्ट्रियता जन्म ले चुकी है– एक खस राष्ट्रियता, दूसरी मधेशी राष्ट्रियता । शदियों से विदेशियों जैसा व्यवहार झेल रहे मधेशियों ने अपनी पहचान के लिए जब विद्रोह किया तो राज्य “हिमाल, पहाड, तराई, कोई छैन पराई” का मन्त्र जाप करना शुरु किया । अपनी राष्ट्रियता की मान्यता स्थापित करवाने की दिशा मे उठा मधेशियों का संघर्ष अब सामान्य लालच से स्थगित होनेवाला नहीं है । मधेशी के प्रति राज्य का नजरिया अभी भी घृणात्मक ही है । यही नजरिया मधेशी को अपनी राष्ट्रियता स्थापित करवाने में सहयोगी भूमिका निवाृह करेगी । खस के साथ अघुलनशील पदार्थ के रुप में रहे मधेशी की पहचान कायम होना समयानुकूल यथार्थ है । खस की यह पौराणिक एकात्मक तथा केन्द्रीकृत राज्यसत्ता का शदियों से जनता के प्रति रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार से अपना विश्वास खो चुकी है । वर्गीय चरित्र का पृष्टपोषक के रुप में लोकप्रिय यह राज्यसत्ता जितना भी लचक हो जाय, इसने ऐसा अभेद्य राज्य व्यवस्था का चक्रव्यूह बना कर रखा है कि इसको समझ पाना ही मुश्किल है । देश की आधी जनसंख्यावाला मधेशी, आन्दोलन के मार्फत राज्य को जिस ढंग से चुनौती दिया है, अपनी पहचान कायम करने की दिशा का बढा हुआ सशक्त कदम है । यह शुरुवाती दौर में भले ही कोई स्थान न बना पावे, किन्तु मधेश द्वारा उठाया गया यह सशक्त कदम अवश्य ही परिणाममुखी बनेगा । क्योंकि राज्य के चरित्र और व्यवहार में कोई परिवर्तन न होने के कारण मधेशी को नेपाली राष्ट्रियता का परिभाषा करने का अवसर जरुर मिलेगा, समय ऐसा ही संकेत दे रहा है ।
प्रान्त, हिन्दी साप्ताहिक में प्रकाशित, २०७० श्रावण ३२ गते (१६ अगस्त २०१३)
