एक पक्षीय राष्ट्रियता औचित्यहीन

 

परिवर्तनशील दुनियाँ में अपरिवर्तनीय नेपाली राज्यसत्ता का अस्तित्व का संघर्ष जारी है । नित नये दाँवपेच का प्रयोग कर अपने ही स्वरुप को स्थापित करना इसका अन्तिम लक्ष्य है । जनता की ही बात का वकालत कर अपना उल्लू सीधा करना राज्य बखूबी जानता है । देश में उठे हरेक संघर्ष की आँधियों को बडा सहज ढंग से राज्य ने आत्मसात किया, किन्तु पूर्वजों द्वारा विरासत में मिला राज्य को किञ्चित भी परिवर्तन नहीं होने दिया । ०६२/०६३ के अकल्पनीय आन्दोलनों से राज्य भयभीत तो हुआ, किन्तु क्षणिक रुप में । आन्दोलनों में उग्रता तो थी, किन्तु साँगठनिक सशक्तता का अभाव था । राज्य ने बडी बारिकियों से इसका अध्ययन कर भावी रणनीतियों का तानाबाना बुनना शुरु किया । आन्दोलन की भीषणता के आगे राज्य घुटना टेक कर एक कदम पीछे हटा । अनिच्छा पूर्वक संविधान सभा को स्वीकार किया । राज्य का पीछे हटना को आन्दोलनकारियों ने अपनी जीत समझ एक भारी भूल किया । जीत के उन्माद में संविधान सभा सदस्यों का अपरिपक्व विचारों ने राजनीतिक  परिस्थितियों का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन न कर पाया । उन्माद ने नयी झूठी दुनियाँ के पीछे दौडाता रहा, मदहोशी की हालत में सदस्यों को जनता की पुकार भी सुनाइ नहीं दी । जिम्मेदाराना भूमिका में आये सदस्यों को अपनी गल्तियों का एहसास तब हुआ जब सबकुछ बदल चुका था ।

परिवर्तनकारी शक्तियाँ अभी भी नशे की खुमारियों में अपनी राजनीतिक सिद्धहस्तता साबित करने के लिए बडबडाते फिर रहे हैं–“देश संघीय लोकतान्त्रिक गण्तन्त्र में जा चुका है । अब देश को पीछे धकेला नहीं जा सकता । संघीयता हमारा प्रस्थान विन्दु बन चुका है । इसको अग्रगमन में जाना ही होगा, आदि आदि…..।” उपरोक्त कथन की सच्चाई तब साबित होती है, जब राज्य इमान्दार हो । समय सापेक्ष राजनीति को इमान्दारी पूर्वक स्वीकार करता हो । राज्य जनताप्रति उत्तरदायी हो । इन परिस्थितियों में यह कथन बिल्कुल सत्य है । लेकिन जहाँ राज्य ही परिवर्तन को स्वीकार न करता हो, यथास्थिति में रहने के लिए परिवर्तन को रोकने का दुस्साहस करता हो, नित नये षडयन्त्र का जन्म देकर राजनीति की सहज गति को अवरुद्ध करे, ऐसे में राज्य के किस नियत पर विश्वास कर उपरोक्त कथन की पुष्टि करावें ।

परिवर्तनकारी शक्तियों की शक्ति क्षयीकरण के लिए लाया गया राजनीतिक गतिरोध लगातार ५ वर्षों से उसके हौसले, उसके इरादे को तिल तिल चाट रही है । देश को संघीयता में न जाने देने का राज्य का दृढ संकल्प और उसे रोकने के लिए व्यूहों का निर्माण कर जिस तरह आरक्षित किया गया है, सहज ढंग से इस किले में प्रवेश करना आसान नहीं है । इन सारी बातों को देखते हुवे कोई भी कह सकता है–“यहाँ न लागे राउर माया ।” हिंसक जीव के पल्ले पडा कोई चीज आसानी से प्राप्त करने का सोच बनाना निरीह मुर्खता नहीं तो और क्या है । राज्य यदि जनपक्षीय होता, तो जनता की आवाज को कब सम्बोधन कर चुका होता । चार साल की संविधान सभा मे ही सबकुछ निपटारा हो गया रहता । किन्तु अनिच्छापूर्वक स्थापित करवाया गया संविधान सभा तो राज्य के पतन का कारण बनता, कैसे उस संविधान सभा को अर्थपूर्ण बनाया जाता ? नेपाली राज्यसत्ता के लिए दानव के रुप में अवतीर्ण संविधान सभा का अन्त कराना राज्य के लिए जरुरी था । संविधान सभा के चार वर्ष के दृश्यों को बारिकी से देखा जाय तो राज्य को समझने के लिए यथेष्ट प्रमाण मिलेगा । इसका गम्भीर अध्ययन ही  हमे दृष्टि और दिशा दोनों प्रदान करेगा । आगामी गतिविधियों को समझने के लिए सहजता प्रदान करेगा ।

आन्दोलन के जिस तेज और प्रखरता पर परिवर्तनकारी शक्तियाँ राज्य की पुनर्संरचना कर संघीयता लेने का सपना देख रही थी, उन शक्तियों को निस्तेज कर उनका पंचनामा बनाकर राज्य बहुत पहले ही अपना काम निबटा चुका है । अब तो सिर्फ क्रियाकर्म की औपचारिकता बाँकी है । राज्य की हार पर इठला रही शक्तियों की हालत धोबी के कुत्तों जैसा बन गयी है । न तेज है न ताकत, बस यदि है तो राजर्षि सुख भोगने का मानसिक विचार ।

किसी को पता भी न चल पाया, राज्य अपने मनसूबों को किस कदर सफलता तक पहुँचाया । दूसरों को शब्दों के व्यूहों में फँसाकर वह अपने हरेक उद्देश्य में सफल होता चला गया । लोग उसकी जितनी भी आलोचना कर ले, राज्य अपनी सफलता पर मुस्कुराता अपने लक्ष्य पूर्त्ति के लिए व्यस्त रहा  । क्योंकि वह समझता है कि सफलता मुझे मिली है, और मेरी प्रतिस्पर्धी शक्तियाँ हार चुकी है । संघीयता इतिहास के पन्नों में जा चुकी है । इसे फिर से पाने के लिए विकराल आन्दोलन को जन्म लेना होगा, जो अभी सम्भव नहीं । तो फिर ये घोषित संविधान सभा का चुनाव क्या है ? लोग प्रश्न कर सकते हैं । इसका जवाव है, संघीयता को अलग रखकर संविधान बनाने का अन्तिम परिणाम दृश्य है जो जल्द ही पटाक्षेप होनेवाला है ।

संघीय शासन इस राज्य को बिल्कुल मंजूर नहीं है । प्रजातन्त्र वा लोकतन्त्र उसी हद तक स्वीकृत है जिस हद तक यह राज्य को फायदा दे सके । जो लोकतन्त्र जनमुखी हो, उससे राज्य का कोई लेना देना नहीं है । ०४६ साल प्रजातन्त्र की पुनर्स्थापना पश्चात् अपने मूल्य और मान्यता को भूलकर प्रजातन्त्र राज्य की दलाली में इस कदर संलग्न हुआ कि चतुर्दिश प्रजातन्त्र की बदनामी हुई । फलतः देश में विशाल आन्दोलन की बाढ सी आ गई । कुछ उपलब्धियाँ सतह पर दिखीं । राजतन्त्र का अन्त तथा संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र का अन्तरीम संविधान में समावेश होना, यह आन्दोलन का मुख्य उपलब्धि कहा जा सकता है । किन्तु, जैसा मैने उपर जिक्र किया है कि राज्य के स्वार्थ की पूर्ति जो प्रणाली नही कर पायी, उससे राज्य का कोई नाता नहीं होता । लोकतन्त्र का ६ दशकों का लम्बा अभ्यास से भी जनता को लोकतन्त्रप्रति आस्था न जगा सका । इसका प्रयोग भी इतने गलत ढंग से हुआ कि जनता प्रजातन्त्र के विरोध में खडी हो गई । फलतः इसके विरोध में आन्दोलन की भीषण आँधी आयीं और सबकुछ तहस नहस हो गया । राज्य को नयी संरचना में ढालकर संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की पद्धति के अनुसार राज्य व्यवस्था संचालन हो, ऐसा ही सर्व सम्मति के आधार पर एक मान्यता बनी और फिर राजनीति अग्रगमन की दिशा में आगे बढी । किन्तु राज्य को हानी पहुँचाने वाला परिवर्तन का हरेक कदम को राज्य कैसे स्वीकार करता । और फिर राजनीति को विपरित दिशा में मोडने के लिए अनेक बहानाबाजी के सहारे राजनीतिक गतिरोध को जन्माकर सबों को परिवर्तन के  मूल उद्देश्य से ही भटका दिया । यह काम इतनी चालाकी से हुआ कि कोई इस साजिश को समझ ही न सका । संविधान सभा में जनता को भ्रमित करने के लिए ८, १०, ११, १२, १४ प्रदेशों का बहस भी करवाया गया । जनता को यह विश्वास हो कि राज्य संघीयता देना चाहता है । असल में राज्य संघीयता चाहता ही नहीं है । संघीयता का विवाद ही नेपाली राजनीति से हट जाय इसलिए तो सभी राजनीतिक दलों ने संविधान सभा का अन्त कर देना ही श्रेयस्कर समझा । जनता प्रत्यक्ष रुप से आन्दोलित न हो जाय, इसलिए संविधान सभा का चुनाव जनता के समक्ष रख दिया गया है । जिस उद्देश्य से संविधान सभा की स्थापना हुयी थी, उस उद्देश्य को राज्य  छोड चुका है । सम्बन्धित पक्षों में संघीयता लेने की बात है भी तो वो इतनी कमजोर अवस्था मे है कि उसकी क्षीण आवाज कोई सुनना नहीं चाहेगा ।

जनता की आवाज को दबाकर एकबार फिर राज्य अपने मनसूबों को स्थापित करने में कामयाब रहा । इस कामयावी में राज्य की कूटनीतिक कुशलता, सक्षमता तथा राज्य व्यवस्था का तीक्ष्ण अनुभव कारक तत्व तो है ही, किन्तु आमूल परिवर्तन की दिशा में चलाया गया आन्दोलन, जिसने राज्य व्यवस्था को जड से हिलाकर रख दिया था, इतनी आसानी से राज्य का शिकार बनकर निस्तेज बन जाना, सबों को अचम्भित करता है । आन्दोलनकारी शक्तियों के कमजोर पक्ष पर राज्य का लगातार आक्रमण से यह शक्ति विश्रृँखलित अवस्था में चले जाने के कारण राज्य की मनोमानी निर्वाध रुप से आगे बढा है । राज्य व्यवस्था परम्परागत स्वरुप में आ गया है । शासकों का जबतक अन्त नहीं हो जाता, राज्यसत्ता हासिल नहीं होती । नेपाल का उत्कर्ष का आन्दोलन सभी सम्झौता में विसर्जन हुआ है । यहाँ राज्य व्यवस्था बदल्ने आयी सभी शक्तियाँ खुद को ही बदलकर यथास्थिति की धार पकड ली । फिर अधिकार न मिलने का मातम मनाना फिजूल है । अधिकार माँगने से नहीं, लडकर ही प्राप्त होता है । और यह काम अभी बिल्कुल ही सम्भव नहीं है । राज्य को परिवर्तन के इस तूफान से अपने को बचाना था, बचा लिया । जबतक फिर कोई प्रलयकारी आन्दोलन नहीं उठ जाता, राज्य का वर्चस्व सबको स्वीकारना ही होगा ।

प्रान्त, हिन्दी साप्ताहिक में प्रकाशित, २०७० श्रावण १८ गते (२ अगस्त २०१३)

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