गाने दो, हमारी भावनाओं के गीत

जन अधिकार सुनिश्चित करने के ध्येय से नेपाल की पौराणिक वर्गीय राज्यसत्ता के विरुद्ध ०६२/०६३ में उठा भीषण जन आन्दोलनों ने न सिर्फ राज्यसत्ता को झुकाया, अपितु सारी दुनियाँ को अपनी ओर देखने के लिए बाध्य किया । नेपाल में उठे आन्दोलन का उग्र रुप रुढिवादी वर्गीय राज्यसत्ता के विरुद्ध आग की लपटों की तरह इस कदर आगे बढ रहा था मानों शदियों से शोषण के दुर्ग के रुप में रहे नेपाल का हरेक किला को जला कर राख कर देगा । आन्दोलन में सरिक मानव सागर का आक्रोश हर प्रकार के शोषण के अवयवों को नष्ट कर डालने के लिए आतुर था । इतिहास के पन्नों में सिमटने के बजाय खुद को सिकोड लेना उत्तम जानकर राज्यसत्ता आन्दोलन के आगे नतमस्तक हो गई । आन्दोलनकारियों को पूर्ण स्वतन्त्रता से आगे बढने दिया गया । जन प्रतिनिधियों के रुप में आये आन्दोलनकारियों का स्वागत सुविधा सम्पन्न संविधान सभा के विशाल पण्डाल में बडी गर्मजोशी से किया गया । राज्य सुविधा का स्वाद चखाकर चार वर्षों के बाद मेहमानों को इस कदर बाहर निकाला गया कि सामूहिक मेहमाननमाजीका फिर नाम न ले सके । आन्दोलनकारी भी अपना सब उद्देश्य भूलकर राज्य के रंगों में यूँ सराबोर हुआ कि इनको जनता अपने प्रतिनिधी के रुप में पहचान भी न पायी । संविधान सभा के कुम्भ के मेले में जनता का प्रतिनिधी खो गया और प्रतिनिधी की जनता खो गयीं । इतने बडे आन्दोलनों का औचित्य ही समाप्त हो गया । प्रतिनिधियों का नेतृत्व भूमिका में कमजोर पडना राज्य के लिये शुभ संकेत था और परिस्थितियों की इस अनुकूलता का लाभ लेते हुवे दलों ने संविधान सभा का अन्त कर बहुत बडा सिरदर्द से छुटकारा पा लिया । आन्दोलनों में शहादत देते हुवे राज्य पुनर्संरचना के माध्यम से जन अधिकार स्थापित करने के लिये जो अवसर सृजना कर  जनता ने अपने प्रतिनिधियों को सौंपा उस अवसर का भरपूर फायदा राज्य को मिला । प्रतिनिधियों ने व्यक्तिगत लाभ के लिये अवसर को उपयोग करने के कारण जनता से नाता टूट गया । धोबी के कुत्ता की तरह वो घर के रहे न घाट के ।

जनता को जन अधिकार से पीछे धकेलने की जो साजिश की गई, वह जनता के पक्ष में बिल्कुल नहीं है । परिवर्तन के प्रवाह को रोककर  क्षणिक आनन्द लेने की साजिश है । नेपाल की वस्तुगत समस्या से परे की राजनीति में समस्या के समाधान खोजने की मूर्खता है । समस्या की गम्भीरता को नकारने और लोकतन्त्र के नाम पर फिर से खस तानाशाही राज्य व्यवस्था को अपने स्वरुप में निरन्तरता देने का आन्तरिक षडयन्त्र है । यह यथार्थता से परे जाल झेल की राजनीति को सजा सवाँर कर नये रुप में प्रस्तुत करने का तरिका है । यूँ तो खस राज्यसत्ता के तरकश में अब शिकार करने के लिये नया कोई वाण नहीं है जिसके वार को जनता न समझ सके । फिर भी चतुर खिलाडी की तरह संविधान सभा का अन्त कर जनता को उसके अधिकार से बञ्चित करने का जो दुस्साहस किया गया है, इसका बहुत बडा मूल्य चुकाना पड सकता है ।

देश सबों का है, यही भावना राष्ट्रियता को सबल बनाती है । परन्तु खस नेतृत्व की पुरानी राज्यसत्ता को पहले की ही तरह अपने कब्जे में रखने की मंशा आज परिवर्तित परिवेश में विल्कुल मान्य नहीं हो सकता । दिखावे के लोकतन्त्र की आड में अपनी पौराणिक तानाशाही प्रवृति को कायम रखने के फलस्वरुप ही यहाँ बार बार आन्दोलन भोगना पडता है । परिवर्तन को रोक कर अपनी कुत्सित प्रवृति द्वारा शासन की पुनरावृति करवाना क्षणिक रुप से आनन्ददायक हो सकता है किन्तु दीर्घकालीन स्थायित्व नहीं ले सकता । लोकतन्त्र का मुखौटा देखकर अन्तर्राष्ट्रिय मित्र शक्तियाँ भी भ्रमित होकर इसे खस वर्चस्व की राज्य व्यवस्था की निरन्तरता में जितना सहयोग करती है, उत्पीडन से मुक्ति दिलाने के लिये नेपाली जनता को मदद नहीं करती । जनता की माँग के विपरित बार बार खस राज्यसत्ता की पुनरावृति से जनता की समस्या सम्बोधन के अभाव में निरन्तर तीव्रतर वृद्धि से जनता का जीवन स्तर गिरता ही चला जा रहा है । बदतर जीवन तो आन्दोलन को ही आमंत्रित करती है । ०४६ साल से नेपाली जनता बेहतर जीवन शैली के लिये पार्टियों के झाँसे में आकर हजारौं कुर्बानियाँ देकर भी सुख चैन के साथ दो शाम की रोटी कमाने का शान्तिपूर्ण बातावरण नहीं पा सका । यदि पाया है तो असुरक्षा, मँहगाई, आतंक, अपहरण, चन्दा असूली, अराजक अवस्था का ताण्डव लीला । २४ वर्ष से प्रतीक्षा कर रही नेपाली जनता शान्तिपूर्ण जीवन जीने के लिये सहज वातावरण नहीं बन पाया । इतने सालों में प्रजातन्त्र, प्रत्यक्ष राजतन्त्र, संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र आदिका अभ्यास होता रहा । जनता चीखती रही शान्तिपूर्ण वातावरण के लिये, किन्तु विभिन्न वेश बनाकर राष्ट्रिय राजनीतिक रङ्गमञ्च पर खसों का ताण्डव इस कदर जारी रहा कि जनता की आवाज इन तक न पहुँच पायी । अभी भी परिस्थितियों में कोई तबदिली नहीं है । राष्ट्रिय राजनीति के मञ्च पर गतिरोध जो नित नये स्वरुप धारण कर सहज अवतरण के मार्ग को अवरुद्ध किये बैठा है, इस राज्य के रक्षार्थ स्थापित है । जन आवाज को सम्बोधन करना न पडे, इसलिये अपने कुत्सित विचारों को अनेक शब्दजाल से परिभाषा करते हुवे सबों को अपने बिषय वस्तु में उलझाकर रोक रखा है । यहाँ किसी का कुछ नहीं चलता । राज्य के हरेक अंगों पर एकाधिकार कायम किये वर्गो का ही यह देश है, ऐसी ही मानसिकता बनाकर इनका शासन और व्यवहार चलता है । गुलामों की तरह बिना आवाज उठाये इनके शासन प्रणाली को मानना ही नेपाल का असल राष्ट्रवादी का पहचान है ।

हम बर्बर युग के गुलाम नहीं, एक्काइसवीं शताब्दि के सभ्य नागरिक हैं । जहाँ अधिकार के साथ जीने की परम्परा बनायी गई है । जहाँ सिर्फ विकास है, शोषण नहीं । संसार ध्रुवीकृत होकर विकास और समृद्धि में लगा हुआ है । नागरिकों को गुलाम की तरह शोषण करके जीनेवाली राज्यसत्ता अब इतिहास के पन्नों में मात्र पायी जाती है । अब ऐसी राज्य अस्तित्व में न रहने के कारण चर्चा करना लोग छोड चुके हैं । उच्चतम विचारों के धरातल पर ऐसी बातों की चर्चा पिछडापन को ही उजागर करती है । इतिहास के पन्नों में चली गई बातें नेपाल में मौजूद है, इस पर किसी को विश्वास नहीं होगा । लेकिन यह सत्य है । नेपाल में अभी भी पौराणिक सामन्ती चरित्रवाला राज्यसत्ता अभी भी  मौजूद है और उस पर शदियौं से अल्प संख्यकों (अभिजातवर्ग) का एकाधिकार है और बहुमत राज्यविहीनता की अवस्था में राज्य के शोषण का शिकार बना हुआ है । अधिकार की आवाज उठती है, किन्तु उसे हर तरह से इसलिये दबा दी जाती है कि नेपाल एक डेमोक्रेटिक देश है और यहाँ जनता की माँग को अतिरञ्जित अवस्था में प्रस्तुत कर कम्युनिष्ट अपना वर्चस्व लादना चाहता है । यही प्रचारबाजी अन्तर्राष्ट्रिय स्तर पर किया जाता है । अन्तर्राष्ट्रिय स्तर पर किया गया ऐसा प्रचार वास्तव में यथार्थ से बाहर है । खस राज्यसत्ता अपना वर्चस्व फिर से लादने के लिये अन्तर्राष्ट्रिय समर्थन प्राप्त करने के लिये ऐसा प्रचार करवाता आ रहा है ।

राज्यविहीनता की अवस्था में उत्पीडन भोग रहे मधेशी, जनजाती, दलित, महिला, मुस्लिम, पिछडावर्ग, अल्प संख्यक आदि अधिकार विहीन नेपाली जनता ने जनता के जीवन शैली को सुधारने के लिये विभिन्न राजनीतिक दल खोल कर बैठे एक ही वर्ग के लोगों को भरोसा कर सिर्फ लडने के लिये ही आगे नहीं आयीं वरन् इन्हें स्थापित करने के लिये हजारौं की संख्या में शहादत दिया । २००७ साल से  ०६३ साल के लम्बे समय में भी जनता का जीवन स्तर न सुधर सका । राज्यसत्ता एक ही वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों के हाथ में हस्तान्तरण होती रही । वर्गीय स्तर सुधरता रहा, जनता कंगाल बनती गई । इस लम्बे समय के अनुभवों ने जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जनता की मुक्ति की बात करने वाली जितनी भी पार्टियाँ हैं, वह एक ही वर्ग के नेतृत्व में है, जो जनता की भावना का नेतृत्व नहीं कर सकती । इस यथार्थ की जानकारी पाने के बाद शोषित, पीडित जनता ने इनलोगों से अलग हटकर अपने लिये आन्दोलन करने का निश्चय किया । ०६३ का आन्दोलन इसी निर्णय का परिणाम है । राज्य के षडयन्त्रों ने इसे भी परिणाममुखी नहीं बनने दिया ।

इस देश की शोषित उत्पीडित जनता को भी देश को अपना कहने, समझने और प्रयोग करने का उतना ही अधिकार है, जितना खसवर्गों का । किन्तु उसे नागरिक का भी दर्जा देना पसन्द न करनेवाला यह वर्ग बहुत दिन तक इस राज्यसत्ता को अपने स्वरुप में बचा कर नहीं रख सकता । गुलाम के रुप में प्रयुक्त जनता अब जाग चुकी है । सामाजिक आवश्यकताओं ने उन्हें अपने नैसर्गिक अधिकार के बारे में सिखा चुकी है । न्यूनतम आवश्यकताओं से बञ्चित होकर लोग बहुत दिन तक नहीं रह सकते । आवश्यकताएँ वस्तु प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्रेरित करती रहती है । सहज वा कठीन प्रक्रिया जो भी हो मनुष्य उसका परवाह नहीं करता । अधिकार विहीन अवस्था के लोगों में अब राजनीतिक चेतना जाग चुकी है । लोकतान्त्रिक अधिकार का अभ्यास कर चुकी है । बञ्चितीकरण में पडी जनता अब अपने को गुलाम नहीं नागरिक समझने लगी है । वह अब मानव अधिकार के बारे में आद्योपान्त विवरण जान चुकी है । वह अपने नैसर्गिक अधिकार को स्वच्छन्द रुप से उपयोग करना चाहती है । अधिकार बञ्चितीकरण की अवस्था में अब नेपाली जनता का रहना मुश्किल है । वह स्वतन्त्र रुप से नीला आकाश में उडान भरना चाहती है । उसकी मुक्ति की भावनायें अंगडाई ले रही है । अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का गीत वह मुक्त कण्ठ से गाना चाहती है । अपनी भावनाओं के उत्ताल तरंगों पर मुक्ति का तराना गुनगुनाना चाहती है । उन्हें भी गाने का हक है, गाने दो ।

प्रान्त, हिन्दी साप्ताहिक में प्रकाशित, २०७० भाद्र १४ गते (३० अगस्त २०१३)

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