चाह नहीं तो राह कहाँ ?

प्रजातन्त्र पुनर्स्थापना पश्चात् कथित प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था ने देश में अनेक आन्दोलनों को जन्म दिया । १० वर्ष की छोटी अवधि में माओवादी का द्वन्द्व तेजी से उभर कर सामने आया । माओवादी द्वन्द्व ने देश को अपने लपेट में इस कदर ले चुका था कि यहाँ सरकार की उपस्थिति नहीं दीख पड रही थी । जनता की अधिकाँश समस्याओं का हल माओवादी कर रहा था । प्रजातन्त्र पुनर्स्थापना पश्चात् सरकार में आये उदारवादी सामन्तों का जमात की एकीकृत प्रवृतियाँ अपने स्वार्थ पूर्ति के लिये शासन व्यवस्था को निजी बना डाला । फलतः प्रजातन्त्र की उपलब्धियों की आश मे बैठी जनता निराश होकर पुनः आन्दोलनों को ही आगे बढाना उचित समझा । विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों का सुत्रपात हुआ । हरेक तबके के लोग जिसका राज्य में पहुँच नहीं था आन्दोलनों में भाग लिया । अब सामने में तथाकथित प्रजातान्त्रिक सरकार दुश्मन के रुप में खडी थी । आन्दोलनों का धार इसी के विरुद्ध केन्द्रित हुआ और फिर ०६२/०६३ में जन आन्दोलन, फिर मधेश आन्दोलन ने शासकीय प्रवृतियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया । सिर्फ प्रजातान्त्रिक सरकार ही पर्याप्त नहीं होता, उसके मर्म अनुसार जन अपेक्षा को समेटकर शासन व्यवस्था की पद्धति होनी चाहिये जिसमें जनता का तीब्र समर्थन हो । इन सब चीजों के अभाव में प्रजातन्त्र के नामपर लादा गया वर्ग विशेष की शासन व्यवस्था आखिरकार जनताद्वारा उल्ट दी गई ।

जन अधिकार की सुनिश्चितता के लिये जितनी लडाइयाँ लडीं गईं, सत्ता प्राप्ति के बाद हर बार जनता के अधिकार के विषय को गौंण रखा गया । सामाजिक रुपान्तरण के हरेक सिद्धान्त का नेपाल की भूमि में अभ्यास होता रहा । संघर्ष में जनता की सहभागिता बढाने के लिये नेतृत्व वर्ग जनमुक्ति की अनेक बातें तो किया, किन्तु सार में नेतृत्व वर्ग सरकार में सहभागिता से अधिक कुछ नहीं चाहा । इस प्रकार जनता हर तरह से अपने अधिकार से बञ्चित ही रही । खसवर्ग की राज्यसत्ता का विरोध करनेवाली पार्टियाँ भी खस नेतृत्व में रहने के कारण यह वर्ग जितनी भी दर्शन की बात करले, हमेशा सत्ता प्राप्ति ही इसका अभीष्ट रहा है । हर आन्दोलन अर्थहीन हो जाने का कारण जानने के लिये जनता को पाँच दशक लग गया । फलतः जनता अपनी नाकामयाबी का सारा भेद जानने के बाद ही जन आन्दोलन और मधेश विद्रोह जनता अपने बलबूते पर किया, जिसके भयावह स्वरुप के आगे सरकार उसकी माँगों को स्वीकारते हुवे देश में संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की शासन पद्धति कायम करने के लिये अन्तरिम संविधान में समावेश किया ।

संविधान सभा की स्थापना हुई । जन अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये ६०१ संविधान सभा सदस्यों की बहाली हुई । लोग वडी उत्साह के साथ नव नेपाल निर्माण की दिशा में सरिक थे, किन्तु राज्य इसके विपरित की मानसिकता लिये इन सब बातों से छुट्कारा पाने हेतु षडयन्त्र की चक्रव्यूह रचने में मशगूल था । जहाँ लोग राज्य रुपान्तरण का सपना संजोये नव नेपाल की कल्पना कर रहे थे, आन्दोलन द्वारा घायल राज्य सबों का सपना चूर करने की साजिश में लगा था । हुआ भी यही । संविधान सभा को निष्कर्षविहीन बनाकर समाप्त कर दी गई । ६०१ को चार सालों की मेहमाननवाजी से बञ्चित करते हुवे राज्य अपने मनसूबों में कामयाव रहा । जनता के अधिकार, संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र अब बहस से बाहर सिर्फ अन्तरिम संविधान में कैद है । आगामी दिनों में फिर संविधान सभा का चुनाव कराने की घोषणा की गई है । जनता को ठगने का नित नयाँ बहाना लाकर उपस्थित किया जा रहा है । संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र को संस्थागत करनेवाली संविधान सभा को जिस उद्देश्य के साथ विघटन किया गया, वही मानसिकता अभी भी विद्यमान है । जन अधिकार बहाल न करनेवाली पार्टियाँ अपने मनसूबों पर जहाँ अटल है, वहीं अधिकार माँगनेवाली शक्तियों को राज्य छिन्न भिन्न बनाकर उसके धैर्य को भी तोड चुका है ।

जिन अधिकार को बहाल करने के लिये आन्दोलन होता आया है, और राज्य अपने संकीर्ण मानसिकता से इसे नजर अन्दाज करता आ रहा है, इससे स्पष्ट है कि राज्य किसी भी मूल्य पर राज्य पुनर्संरचना करना नहीं चाहता है । अभी तक धोखा खाती आ रही नेपाली जनता संघीयता से पीछे हटनेवाली भी नहीं है । सम्पूर्ण साधन स्रोत पर सरकार का एकाधिकार रहने से वह षडयन्त्र करने में सफल हो जाती है और जनता को एकबार फिर पीछे हट जाना पडता है । यही क्रम अभी तक चलता रहा है । इसी क्रम में राजतन्त्र का भी उन्मूलन हुआ । जनता और राज्यसत्ता के संघर्ष में भले ही बार बार जीत सत्ता की हुई है, किन्तु वर्गीय राज्यसत्ता की शक्ति का क्षयीकरण भी होता आया है । राजतन्त्र का अन्त भी इसी शक्ति क्षयीकरण का एक हिस्सा है ।

अन्तर्राष्ट्रिय स्तर पर ६ दशकों का प्रजातान्त्रिक अनुभव की गाथा सुनानेवाली नेपाली राज्यसत्ता असल में प्रजातान्त्रिक संस्कार का विकास कर ही नहीं पायी है । राज्यसत्ता जितना भी छद्यवेश धारण कर ले सामन्ती चरित्र का वास्तविक रुप प्रकट हो ही जाता है । ०४६ साल पश्चात् की प्रजातान्त्रिक सरकार में प्रदर्शित राज्य का सामन्ती चरित्र इसका बेमिसाल उदाहरण है । सिर्फ चुनाव करवाना ही लोकतान्त्रिक पद्धति नहीं है । चुनाव तो राजतन्त्र भी करवाता था । वह जनता की पद्धति नहीं मानी गई । अपने को प्रजातान्त्रिक स्वरुप में रखकर सामन्ती चरित्र का प्रदर्शन करना, जन अधिकार की बहाली बिषय में उदासीन रहना, कपटपूर्ण नीति से शासन करना, धरातलीय समस्या को अनदेखा करना आदि व्यवहारों को लोकतान्त्रिक पद्धति में नहीं रखा जा सकता । ऐसी लोकतान्त्रिक पद्धति जिसमें बारबार अधिकार आन्दोलन उठ रहा हो, को अन्तर्राष्ट्रिय मान्यता बिल्कुल भी मिलनी नहीं चाहिये । लोकतान्त्रिक मान्यता प्राप्त कर यह वर्गीय राज्यसत्ता हमेशा सामन्ती तानाशाही चरित्र का ही प्रदर्शन किया है । आन्दोलन उठने का, जन अधिकार का अवमूल्यन और एक पक्षीय तानाशाही व्यवहार ही मुख्य कारण है । ०६२/०६३ का जन आन्दोलन और मधेश आन्दोलन संसार को ही अपनी ओर आकर्षित किया । जन अधिकार की माँग इस कदर उठेगा, इसके बारे में न नेपाली राज्यसत्ता, न इसका पडोसी मित्र सोच सका था । किन्तु शदियों से राज्यविहीनता की अवस्था में पडी नेपाली जनता का अपने अधिकार के लिये यह ज्वालामुखी सदृश विस्फोट था । संसार के देशों को यह जानकारी थी कि प्रजातन्त्र के नाम पर नेपाली राज्यसत्ता नेपाली जनता को अभी भी दास और गुलाम बनाकर रख रही है । जन आन्दोलन नेपाली  राज्यसत्ता का भण्डाफोर था ।

०६२/०६३ में भीषण तूफान की तरह आया आन्दोलन एकबार सब कुछ बदल कर रख दिया । ऐसी ही अनुभूति हो रही थी । किन्तु धीरे धीरे सब कुछ सामान्य होकर पूर्वावस्था में जा रहा था । यह सब सहज रुप से नहीं, एक बिशेष परिस्थितिवश हो रहा था । जनता द्वारा उठायी गई माँग जिसमें संघीयता सामिल था, जो परम्परागत राज्यसत्ता के लिये असहज था उसको लेकर राज्य एक तरफ सहिष्णु बना हुआ था तो दूसरी तरफ संघीयता के विरोध में अनेक साजिशों की रणनीति बना रहा था । बडी चतुरता के साथ संविधान सभा को राजनीतिक दाँवपेंच द्वारा अवरुद्ध कर चार साल के बाद अन्त कर दिया गया । संघीयता के बहस को  सदा के लिये अन्त कर दिया गया । फिर से संविधान सभा का चुनाव महज एक देखावटी है । अन्तरिम संविधान में सामेल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के मर्म को आत्मसात कर जन अपेक्षित संविधान आगामी संविधान सभा नहीं दे सकती । जन्म से ही स्वस्थ पहला संविधान सभा बिना प्रयोजन मृत्यु को प्राप्त हुई, दूसरी संविधान सभा तो अपाङ्ग ही पैदा होनेवाली है । क्षमताहीन अवस्था की यह संविधान सभा दिख तो पडेगी, किन्तु फलीभूत होना मुश्किल है । निकाश द्वार खोज रही राजनीतिक पार्टियाँ असल में यह बाहर निकलना ही नहीं चाहती हैं । नये परिवेश में हैसियत का घट जाना इन्हें स्वीकार नहीं है । इसलिये भी ये चुनाव का प्रचार करके भी नहीं चाहते कि चुनाव हो । वैद्य पक्ष का विरोध इनके लिये रामवाण सावित हो रहा है । कोई तो हो जो अपने उपर दोष लेकर चुनाव का स्थगन करे । इसी आन्तरिक धारणा से ग्रसित है सब । चुनाव के माहौल को सबों के लिये अनुकूल बनाकर आवश्यक सहयोग प्रदान कर भारत ने जो सहृदयता दिखलाया है, उसके आगे चुनाव से भागना तीन दलों के लिये बिल्कुल भी सम्भव नहीं है, और चुनाव में अभी तत्काल जाने का अर्थ है कद छोटा होना । इसलिये एमाओवादी का प्रयास है कि मोहन वैद्य यूँ ही विरोध का नाटक कर चुनाव को स्थगन में ले जाय । मोहन वैद्य कल २६ भाद्र ०७०, नागरिक दैनिक में कहा है कि मुझे चुनाव में सामेल करने के लिये चुनाव की तिथि को आगे बढाया जाय ताकि मुझे भी प्रचार प्रसार का अवसर मिले । जाहिर है, एमाओवादी की समानान्तर पार्टी आन्दोलन छोडकर चुनाव में आना चाहे तो अवसर मिलना ही चाहिये । इस ढँग से चुनाव को आगे बढाने की साजिश हो रही है । मोहन वैद्य की पार्टी जिस तरह नरम बनती दिख पड रही है, एमाओवादी चाहेगा कि मोहन वैद्य फिर से पार्टी में समावेश हो ताकि आगामी चुनाव में सबको मात दे सके । इसलिये भी इसको अवसर की तलाश है । मोहन वैद्य के पास भी वार्ता के लिये कोई एजेण्डा नहीं रह गया है । जो एजेण्डा सार्वजनिक हुआ है उसके आधार पर सरकार अब उनको वार्ता में बुलाने से रही । इसलिये मोहन वैद्य प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का ध्यानाकर्षण करने के लिये इस बात को सार्वजनिक किया । बहुत सम्भव है कि प्रमुख तीन दल इस बात को मान ले ।

द्यलगत स्वार्थ में चिपके सभी राजनीतिक दलों का भिन्न स्वार्थ पूर्ति में प्रयुक्त राजनीतिक स्वरुप इतना दुषित और पूर्वाग्रही हो गया है कि यह जन अधिकार के बारे में गम्भीर हो ही नहीं रहा है । चुनाव की तिथि तो आगे जायगी, किन्तु राजनीतिक पार्टियाँ जन अधिकार बहाली करने के लिये इमान्दार बन पायेंगी ? कमजोर पड गई संघीयता पक्षधर शक्तियाँ आगामी संविधान सभा चुनाव में पहले से भी अधिक प्रतिनिधी भेजकर संघीयता बहाल कर पायेंगी ?

प्रान्त, हिन्दी साप्ताहिक में प्रकाशित, २०७० भाद्र २८ गते (१३ सेप्टेम्बर २०१३)

Leave a Comment

error: Content is protected !!