प्रतिशोधक आगि

बेटाक द्विरागमनक शुभ–दिन,
नव–बधुक आई प्रवेशकाल ।
आहत बधु, सासु ननदिके,
व्यँग्य वाण सँ परिछैन काल ।।१।।

भयभीत, विध करैत बधु,
सब प्रहारक लेल तयार ।
देखैत दुर्भाग्यक खेलसब,
सहैत सवहक दुव्र्यवहार ।।२।।

देवता के प्रणाम क के बधु,
बैसलीह आबि कोहबर माझ ।
बेशर्म बापक बेटी थिकीह,
कियेक रहतैन्ह कोनो लाज ।।३।।

लगौलन्हि जनम भरि के,
दाग हमरा पिता आ भैया ।
सासुरक प्रताडित जीवनसँ,
उद्धार होयत हमर कहिया ।।४।।

ननैद फुफकारि उठलीह,
स्त्रीगण विहँसि दैत गारि ।
बाप भायके निल्र्लज्जताक,
परिभाषा करैत सब नारि ।।५।।

फेंफ काढने सासु ननदि,
फेंफियैत दुनु नाग समान ।
चोरा क करौलन्हि विवाह,
नहिं कोनो साँठ समान ।।६।।

स्त्रीगण सबके देखाबऽ लगलीह,
साँठक समान आँगन मे फेक ।
घृणासँ दहकैत छल सासु ननदि,
बधु सोचथि भाग्यक लेख ।।७।।

छैन्ह आक्रोश सासु ननदिके,
उठैत छैन्ह क्रोधक ज्वाला ।
सेवा कए मना लेव सबके,
पहिराकऽ अपन नोरक माला ।।८।।

सासु के प्रणाम करऽ गलीह,
बधु के लात मारलन्हि सासु ।
अछि हमर कोन दोष अम्मा,
कियेक बनल छी रक्तपिपासु ।।९।।

जुनि करु एहन काज काकी,
की दोष ऐ अवला के हाय ।
स्त्रीगण सब बाजि उठलीह,
कुकृत्य केलन्हि बाप, भाय ।।१०।।

एकलाख टाका कियौ दैत,
बेटाक विवाह मे व्यवस्था ।
ई अलच्छिनी मेटौलक सब,
शौख, मनोरथ, सब ईच्छा ।।११।।

बेटा पोसि पालि पढा लिखाकऽ,
रखने छलहुँ ई अलच्छिनी लेल ।
सबहक आश पर पानि फेरि,
देखा देलक अपन नकट्टा खेल ।।१२।।

बेटा के बान्हि अनलन्हि सब,
कालेजसँ, कलेजा नहि फाटत ?
हमरा मोन मे जे घाव भेल,
ओहि पीडा के के बाँटत ।।१३।।

हमरो कन्यादानक समस्या,
जहिना के तहिना रहि गेल ।
पाईसँ कन्यादान करितहुँ,
सपना हमर सपने रहिगेल ।।१४।।

आव कन्यादान करवाक लेल,
हमर जाय जेथा सब जायत ।
सम्पत्ति सबकछिु नाश होयत,
बाल बच्चा सब कि खायत ?।१५।।

करमक लेख छी, सोचू,
विसरि जाउ व्यथा कथा ।
बेटा कमायत, तखन,
जोडि लेव जाय जेथा ।।१६।।

स्त्रीगण सब गलीह तखन,
काकी के समझाय बुझाय ।
ननदि घर मे वधुक उपर,
किरासन सँ देलन्हि नहाय ।।१७।।

नव–वधु बुझलन्हि, हँसि
ठट्टा करै छथि दाय ।
चिचिया उठलीह जखन,
आगि देलकन्हि लगाय ।।१८।।

धू धू जऽ रऽ लगलीह,
निर्दोष अवला नारि ।
दाय लहकावथि आगि,
किरासन देह पर ढारि ।।१९।।

प्राण बचावक प्रयास मे,
सबके नेहोरा करथि बधु ।
किनको नहिं छलन्हि दया,
जरैत नव वधु धू धू ।।२०।।

माय दौडि दरवाजा पर,
बेटाक देलन्हि समाचार ।
बाप बेटा दौडि आयला,
मायबेटी कनैत जारजार ।।२१।।

जरि गेलन्हि शरीरक अंग,
जीवन, आ शोख मनोरथ ।
सबहक पीडा समेटि बधु,
चलि गेलीह चढि मत्युरथ ।।२२।।

कोना भेल ई महा प्रलय,
पुछलन्हि शोकाकुल पिता ।
दिप सँ लागलन्हि आगि,
कनैत कहलन्हि सुता ।।२३।।

मेल मिलापक अभाव मे,
विवाहक भेल दुष्परिणाम ।
बलि चढि गेलीह कन्या,
जेतीह कतेक सुरधाम ।।२४।।

जबरदस्ती वर आनि कऽ
करै छथि बेटीक विवाह ।
चिंता नहिं सासुरमे बेटी,
पीडा भोगतीह अथाह ।।२५।।

डर, त्रास सँ मुक्त होउ,
चिंता नहिं करु हमर ।
बाप भायके गल्ती केर,
बेटीक पीवे पडैछ जहर ।।२६।।

गलत प्रारम्भक होयछ,
अशुभ अन्त हम जनैछी ।
आग्रह अछि करु दोसर,
अज्ञात भयसँ हम कनैछी ।।२७

स्मरण कय कनियाँक,
चतुर्थी रातुक वचन ।
सत्ते कऽ रऽ पडलन्हि,
सुलीपर जीवन अर्पण ।।२८।।

कनियाँक निश्छल भावसँ,
मेटा गेल क्रोधक ज्वाला ।
विवाहक बन्धनसँ करैछथि,
मुक्त, केहेन ई सुन्दर बाला ।।२९।।

चोराकऽ विवाह करौलन्हि,
मुदा भेटल नीक मनुख ।
नीक जीवन संगिनी पावि,
बिसरि गेलहुँ अपन दुःख ।।३०।।

प्रफुल्ल छलहुँ मनेमन,
सुन्दर कनिया पावि ।
कि अनर्थ भेल अवितहिं,
कोना राखू पीडाके दावि ।।३१।।

स्त्रीक रक्षाक दायित्व,
पूरा नहि करऽ सकलहुँ ।
जीवनभरिक पाश्चाताप
पापक भागिदार भेलहुँ ।।३२।।

विश्वास कऽ के एलहुँ,
मुदा भेल विश्वासघात ।
सहि नहिं सकव पीडा,
मन पर जे भेल आघात ।।३३।।

नतमस्तक रहब सदिखन,
देखि अहाँक त्याग महान ।
दहेजक धधकैत ज्वालामे,
कयलहूँ अपन जीवनदान ।।३४।।

दहेजक धधकैत आगिमे,
बेटी मात्र कियेक जरैछ ।
अग्निपरीक्षाक ताण्डवमे,
बेटीक बलि कियेक करैछ ।।३५।।

भडकि गेल क्रान्तिज्वाला,
देखि अहाँक त्याग महान ।
संकल्प लेलहुँ मेटाव लेल,
मिथिलाक बेटीक बलिदान ।।३६।।

२०४८ फाल्गुन  १७ गते, फत्तेपुर – ८  बलार्दह, सप्तरी 

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