उजाले की खोज में भटकती राजनीति

 

नेपाल बहुजातीय, बहुसाँस्कृतकि, बहुधार्मिक, बहुभाषिक स्वतन्त्र राष्ट्र है । २.६ करोड जनसंख्यावाला यह देश हिमालय क्षेत्र, पहाडी क्षेत्र और तराई क्षेत्र तीन भौगोलिक क्षेत्र में विभाजित है । नेपालका कूल क्षेत्रफल १,४७,१८१ वर्ग किलोमीटर है । तराई १४%, पहाड ६३% (तलहटी १३%, मध्य पहाड ३०%, तथा उच्च पहाड २०%) तथा हिमालय क्षेत्र २३% भाग मे फैला हुआ है । यहाँ एक ही मौसम में तराई में प्रचण्ड गर्मी का सामना करना पडता है तब हिमालय क्षेत्र में कलेजे को कँपकँपाती ठँड पडती है । नेपाल विविध भौगोलिक अवस्था समेटे, बहुमूल्य जडीबूटियों और प्राकृतिक सुन्दरता का देश माना जाता है ।

नेपाल सर्वोच्च शिखर सगरमाथा, हिम श्रँखला की अनुपम छटा तथा प्राकृतिक सौंदर्य से विश्व रंगमंच पर अपनी पहचान कायम रखा है । सृष्टि का दुर्लभ साक्षी के रुप में खडा हिम आच्छादित पहाडों की श्रृँखला विश्व के सैलानियों का आकर्षण का केन्द्र रहा है । यही कारण है कि विश्व का बदलता स्वरुप नेपाल को भी बदलने पर मजबूर करता रहा है । विश्व का राजनीतिक परिवर्तन से हिमालय की गोद में, चीन और भारत दो महाशक्ति देशों के बीच में छोटा सा स्वतन्त्र राष्ट्र नेपाल भी अछूता न रह सका । छ दशक के राजनीतिक इतिहास को देखा जाय तो बहूत सारे परिवर्तन को हम देख पाते हैं । राणा शासन का अन्त, निर्दलीय शासन व्यवस्था तथा राजतन्त्रका अन्त उल्लेखनीय परिवर्तन हम मान सकते हैं । प्रजातन्त्र से लोकतन्त्र और फिर संघीय गणतन्त्र तक का सफर हमने पार कर लिया किन्तु उपलब्धि के नाम पर हम बैशाखनन्दन ही बने रहे ।

नेपाल की पौराणिक राज्यसत्ता (२४०¬ वर्षों से ) जिसको शाहवंशीय प्रथम राजा पृथ्वीनारायण शाह ने स्थापना किया था, जो गोर्खाली राज्यसत्ता के नाम से जाना जाता है, एकात्मक और केन्द्रीकृत स्वरुप में अद्यावधि कायम है । ‘फले फुले न बेंत, जौं मिले गुरु विरञ्ची समऽ’ वाली कहावत चरितार्थ करते हुवे बहुआयामिक परिवर्तनों के थपेडों को झेलते अपने अपरिवर्तनीय स्वरुप में कायम है । अनेक झंझावातों को आत्मसात करते हिमालय सदृश अडिग, अविचल रहना ही गोर्खाली राज्यसत्ता की विशेषता है । ब्राह्मणों और क्षत्रियों द्वारा पालित, पोषित यह राज्यसत्ता इसी वर्ग की सेवा में सदैव प्रयोग होता आया है । विरासत में मिले दायित्व को निर्वाह करते हुवे जन अधिकार हेतु उठे हरेक आन्दोलन को निस्तेज कर राज्य की मौलिकता बनाये रखना इस राज्यसत्ता की विशिष्टता को उजागर करता है । राणा शासन का अन्त हुआ, राजतन्त्र का अन्त हुआ परन्तु रुढिवादी पौराणिक सामन्ती चरित्रवाला राज्यसत्ता में कोई परिवर्तन न आया । छ दशकों से अभ्यासरत् प्रजातन्त्र भी इस राज्यसत्ता के वर्गीय चरित्र का रुपान्तरण न कर सका । राज्यसत्ता तो जनमुखी न बन पाया, प्रजातन्त्र भी इसी वर्ग के स्वार्थ पूर्त्ति का साधन बना । वर्गीय स्वार्थ में प्रयोग हुवे मूल्य और मान्यता से बञ्चित प्रजातन्त्र वर्षों से उठ रहे जन आवाज को न सिर्फ दबाया, बल्कि जनताको उनके अधिकार से बञ्चित रखा । फलतः जन अपेक्षा के साथ सरोकार न रखनेवाला प्रजातन्त्र कलंकित और बदनाम हुआ । प्रजातन्त्र का गलत प्रयोग के कारण जनता का भरोसा उठ गया । जन अपेक्षा को समेट्ने का मतलब था सत्ताधारी वर्गों के स्वार्थ की कटौति, जो कभी इस सत्ताको मंजूर नहीं था । जडसूत्रवादी राज्यव्यवस्था सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं को अनदेखा करती गई । जन अपेक्षा को न समेट्नेवाला प्रजातन्त्रप्रति जन आस्था घटती गई । सामाजिक आवश्यकता, अवसर और सम्भावनाओं के अभाव में सामाजिक विद्रोह जन्म ले रहा था । सन् १९९० के दशक से सक्रिय अभ्यास मे रहे कथित प्रजातन्त्र के विरुद्ध सन् २००६ में नेपाली जनता भीषण आन्दोलन में उतर गईं । २००७ में मधेश ने भी विद्रोह कर दिया । ततपश्चात् अधिकार से बञ्चित अनेक समुदायों ने अधिकार की आवाज को बुलन्दी दी । देश के कोने कोने से उठ रही अधिकार की आवाज से राज्यसत्ता भयभीत हुई । मधेश ने संघीयता और समावेशी का मुद्दा उठाया । सभी अधिकारकर्मियो ने इस मुद्दा को साझा मुद्दा बनाया । टूट्ने से झुकना बेहतर समझकर राज्य मधेश आन्दोलन के आगे घुटना टेकते हुए ‘संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र’ को अन्तरिम संविधान में समावेश करके इसे राष्ट्रिय मुद्दा के रुप में स्वीकार किया । संविधान सभा द्वारा राज्य पुनर्संरचना के माध्यम से राज्यसत्ता का संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में रुपान्तरण करने का राष्ट्रिय लक्ष्य निर्धारण हुआ ।

संविधान सभा की स्थापना हुई । संविधान सभा की पहली बैठक से राजतन्त्र का अन्त कर जनता का विश्वास हासिल करने का प्रयास किया । इसी विश्वास की आड में राज्य, संघीयता विरुद्ध की योजना बनाने का मनसूबा बनाया । राज्यसत्ता द्वारा पोषित वर्ग भयभीत रहते हुवे भी संघीयता देकर अपने अधिकार को बाँटने के लिए कतई तयार न था । आगे संविधान सभा की सुली भी थी । जन प्रतिनिधियों में नया नेपाल निर्माण करने का नया जोश, स्फूर्त्ति और तरंग को देखते हुवे राज्य एक कदम पीछे हटकर संघीयता के बढते प्रभाव को रोकने का रणनीति बनाने लगा । अढाई शताब्दियों से विद्रोह और आन्दोलन के अनेकों तूफान को झेलकर पाताल तक जड जमाई हुई राज्यसत्ता कूटनीतिक रुप से काफी सक्षम थी । जब संविधान सभा के प्रतिनिधीं नये नये सपने देखने में तल्लीन थे, राज्य संघीयता के रुप में जन्मे महिषासुर को बध करने की योजना में अपनी सारी शक्ति लगा रहा था । संविधान सभा की शुरुवाती दौर में नयी ताजगी के साथ सहज रुप से बढती राजनीति को विभिन्न षडयन्त्रों के तहत अवरुद्ध  किया जाने लगा । संघीयता बिषय को जटिल बनाते हुवे राजनीतिक गतिरोध के माध्यम से संविधान सभा को ही अर्थहीन बनाकर समाप्त किया गया । संविधान सभा के इन चार वर्षों में राज्य संघीयता बिषयक चर्चा को न सिर्फ राष्ट्रिय राजनीति से अलग किया, बल्कि अधिकार खोजनेवाली तमाम शक्तियों को तोडकर तहस नहस कर दिया । नेपाली जनता विद्रोह न कर दे, फिर से संविधान सभा का चुनाव कराने की घोषणा कर दी गई है । अधिकार माँगनेवाली शक्तियों को  कमजोर बनाने के पश्चात् राज्य के लिए मैदान बिल्कुल साफ हो गया है । अब यदि संविधान सभा का चुनाव हुआ भी तो वहाँ अधिकार माँगनेवालों की उपस्थिती न्यून रहने से राज्य को कोई क्षति नही होगी । अपने मनसूबों में कामयाब राज्य एकबार फिर से अधिकार आन्दोलनों को पीछे धकेलकर राज्य के एकात्मक स्वरुप को ज्यों का त्यों कायम रखने में सफल रहा । अन्तरिम संविधान में सिसकता संघीयता का प्रश्न आगामी संविधान सभा में भी अनुत्तरित रहने की सम्भावना प्रवल है । क्योंकि आनेवाली संविधान सभा पर इन्हीं वर्गों का वर्चस्व रहेगा और जन अपेक्षित सवालों का सम्बोधन यह संविधान सभा नहीं कर पायेंगी ।

जन आन्दोलन की खुमारियों को हटाने के पश्चात् राष्ट्रिय राजनीति मञ्च पर एक ही वर्ग द्वारा दो प्रतिस्पर्धी (राज्य और जनता) की भूमिका द्वारा एक अनूठा नाटक का मञ्चन करवाया जा रहा है, जो जनता की समझ से परे है । जन अधिकार की समाप्ति पर प्रतिक्रियात्मक आन्दोलन न उठे इसलिए राज्य ने यह मनोरञ्जनात्मक राजनीति नाटक तयार कर जनता को खुश किया जा रहा है । कोई जनता की भूमिका में राज्य को ध्वस्त करने की धमकी देता है तो कोई राज्य की भूमिका में संघीयता और लोकतन्त्र की दुहाई देता है । कोई संविधान सभा होने न देने, संघर्ष करने को उद्धत दिखाई देता है तो कोई किसी भी हालत में चुनाव करवाने की बात करता है । पक्ष विपक्ष दोनो उग्र भूमिका में लगता है, जंग ही छिड जायगा । किन्तु वैसा कुछ होनेवाला नहीं है । हाँ दर्शक की जिज्ञासा को कुछ अधिक ही बढा दिया है । वास्तव में राष्ट्रिय राजनीति के मञ्च पर मञ्चन हो रहा यह नाटक दर्शनीय है । नाटक की समाप्ति पर जनता को खाली हाथ घर लौटना है ही । नाटक का सुखद अन्त हो या दुःखद, राज्य के कलाकार की बाहबाही तो होगी ही । संघीयता जैसे जन अपेक्षित मुद्दा को राष्ट्रिय राजनीति से बाहर फिकवाने में जो कुशल भूमिका निर्वाह की है ।

नेपाल में राजनीतिक परिवर्तनों की कई बार आँधियाँ आयीं, पात्र बदला, किन्तु पौराणिक राज्यसत्ता का स्वरुप न बदला । केन्द्रीकृत राज्यसत्ता ने प्रत्येक १० वर्षों मे आन्दोलन लाने का नेपाल का नियति बना दिया । सम्बोधन के बिना जन सरोकार का बिषय आन्दोलन के रुप में प्रस्फुटित होता रहा । कूटनीतिक चाल से राज्य जन पक्षीय आन्दोलनों को हमेशा पीछे धकेलता गया । अपने मूल्य और मान्यता से बञ्चित कर देश मे आया प्रजातन्त्र को भी अपने स्वरुप में ढालकर अपनी सेवा का बस्तु बना लिया । माओवादी का १२ वर्ष का जनयुद्ध, ०६२/०६३ का जन आन्दोलन तथा मधेश विद्रोह भी नेपाल की शक्तिशाली राज्यसत्ता के आगे टिक न सका । बडी शालीनता और चातुर्य शैली में जनता के आन्दोलनों को निरुत्तर और निस्तेज बनाते हुवे एकात्मक, केन्द्रीकृत, सामन्ती राज्यसत्ता के एकाधिकार की निरन्तरता देना इसका एकमात्र उद्देश्य रहा है । विश्व के परिवर्तित परिवेश में यह राज्यसत्ता भी उदारता का चोला तो पहन लिया है लेकिन चरित्र वही है । प्रजातन्त्र, लोकतन्त्र वा गणतन्त्र जो भी प्रणाली आ जाय, गोर्खाली राज्य के मूल्य और मान्यता से प्रभावित होकर वह अपना स्वरुप खो बैठता है । यही इस राज्यसत्ता की सबसे बडी विशेषता है ।

जन अधिकार की बातें इस राज्यसत्ता के लिए कोई मायने नहीं रखती । अतः जन अधिकार की आवाज नेपाली राज्यसत्ता की कूटनीतिक चाल में दब गई है । यह सत्य है कि अधिकार आन्दोलन कभी समाप्त नहीं होता । यह और भी परिष्कृत तथा निर्णायक रुपमें आयेगा, क्योंकि पृथ्वी पर कुछ भी शाश्वत नहीं है । इस पुरानी गोर्खाली राज्यसत्ता का पतन ही नेपाली जनता के अधिकार का ग्यारेन्टी है । विगत के भीषण आन्दोलन पर विजय पाकर राज्यसत्ता कुछ बर्षों के लिए सुरक्षित तो हो गया है किन्तु परिवर्तन के लिए छटपटाता समाज एक न एक दिन इस सत्ता की समाप्ति का कारण भी बनेगा, यह निश्चित है ।

प्रान्त, हिन्दी साप्ताहिक में प्रकाशित, २०७० श्रावण ४ गते (१९ जुलाई २०१३)

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